हल्दीघाटी

महाराणा प्रताप का शौर्य प्रांगण

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मेवाड़ी महामंत्र है, सब ग्रंथन को सार। जों ढृढ़ राखे धर्म को, तिही राखे करतार।।

रक्त तलाई भारतवर्ष में मेवाड़ के महान सपूत प्रातःस्मरणीय, वीर शिरोमणी महाराणा प्रताप का नाम मातृभूमि के अमर सैनानी के रूप में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। हल्दीघाटी का जनयुद्ध इतिहास का वह स्वर्णिम अध्याय है, जिसके स्मरण मात्र से भारतीय पराधीनता के कालचक्र में कई देश भक्तों को प्रेरणा मिली और वे देश हितार्थ शहीद हो गये। मेवाड़ पर मुगल आक्रमण के समय स्वाधीनता को बचाये रखते हुए मातृभूमि की वेदी पर महाराणा प्रताप द्वारा आयोजित इस पावन यज्ञ में हाकिम खाँन सूरी जैसे पठानी लड़ाके ने सेना की कमान सम्भालते हुए अपने प्राणों को न्यौछावर कर साम्प्रदायिक एकता का परिचय दिया, झाला मान सिंह, भीलू राणा, ग्वालियर नरेश रामशाह तँवर, भामाशाह सहित कई अगणित यौद्धाओं ने मेवाड़ की आन, बान, शान के खातिर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया, मूक अश्व चेतक ने अपने प्राणों की आहुति देकर स्वामी भक्ति का अनुपम उदारहण प्रस्तुत किया। विश्व प्रसिद्ध युद्धस्थली हल्दीघाटी सभी स्वतन्त्रता प्रेमियों के लिये अमर तीर्थ हैं।

हल्दीघाटी पर्यटन

अरावली पर्वतमाला की गोद में स्थित हल्दीघाटी मेवाड़ का विश्व प्रसिद्ध रणक्षेत्र है। स्वतन्त्रता प्रेमियों के लिए अजर अमर प्रेरणा की स्त्रोत यह रणभूमि, जिसकी तीर्थ यात्रा कर स्वतन्त्रता के पुजारियों का मस्तक महाराणा प्रताप और उनके स्वामी भक्त अश्व चेतक सहित मेवाड़ी सेना में भाग लेने वाले शूरमाओं एवं आदिवासीयों ( भीलों ) के प्रति श्रद्धा से अवनत हो उठता हैं। ऐसे इतिहास प्रसिद्ध हल्दीघाटी का शौर्य पूर्ण संग्राम जो कि भारतीय इतिहास में स्वर्णांक्षरों मे अंकित है और आज भी सूरमाओं की प्रेरणाओं का अमर स्त्रोत हैं। भारत की आजादी के बाद भारत सरकार ने 21 जून 1976 को शौर्य-युग का स्मरण करते हुए हल्दीघाटी युद्ध की चतुःशती समारोह का आयोजन हल्दीघाटी में किया था। इस अवसर पर तत्कालिन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी द्वारा चेतक समाधी के सामने बने राजस्थान राज्य पर्यटन विकास निगम के मोटल पर विभिन्न राजमहलों से एकत्रित हल्दीघाटीकालिन अस्त्र शस्त्रों की प्रदर्शनी का उद्घाटन कर अवलोकन किया गया व बादशाह बाग में आयोजित समारोह जिसमें लगभग 1 लाख जनता एकत्रित हुई थी, उसे सम्बोधित कर महाराणा प्रताप के शौर्य, त्याग, बलिदान, निष्ठा और स्वाभिमान की याद दिलाते हुए राष्ट्रीय एकता की बात दोहराई व महाराणा प्रताप से जुड़े स्थलों के विकास हेतु मेवाड़ काॅम्पलेक्स योजना की घोषणा की, उस समय का दृश्य देख हल्दीघाटी युद्ध की याद में उपस्थित प्रत्येक प्राणी में राष्ट्र प्रेम की भावना जाग्रत हो उठी । हल्दीघाटी युद्ध स्थल

महाराणा प्रताप - जीवन परिचय

मेवाड़ के महान सपूत प्रातःस्मरणीय, वीर शिरोमणी महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया का जन्म जेठ सुदी तृतीया, विक्रम सम्वत् 1597-दिनांक 9 मई, 1540 रविवार को राजसमन्द जिले की दुर्गम पहाड़ियों में स्थित ऐतिहासिक दुर्ग कुम्भलगढ़ में महाराणा उदयसिंह की रानी जयवन्ती बाई सोनगरा की कोख से हुआ। इनका बचपन किलेदार आशा शाह की देख रेख में कुम्भलगढ़ में व्यतीत हुआ। हल्दीघाटी युद्ध स्थल महाराणा उदयसिंह अपनी दस रानियों में अतिप्रिय रानी धारबाई भटयाणी के पुत्र जगमाल को मेवाड़ का शासन सौंपते हुए सन् 1572 में स्वर्गवासी हो गये। उस समय प्रताप ने ज्येष्ठ पुत्र होकर भी इसका विरोध न कर अपने अच्छे संस्कारो का परिचय दिया । लेकिन वफादार मेवाड़ी सरदारों व मंत्रियों ने जगमाल को अयोग्य घोषित कर फाल्गुन सुदी 15,विक्रम सम्वत् 1628 - दिनांक 28 फरवरी,1572 को ही गोगुन्दा में महाराणा प्रताप का राजतिलक कर दिया। राजतिलक के मात्र चार वर्ष पश्चात् मुगल सम्राट अकबर के मेवाड़ पर आधिपत्य करने की योजना के चलते मुगलों द्वारा कुम्भलगढ़ पर 3 अप्रेल 1576 को आक्रमण कर अधिकार कर लिया गया । जिससे आहत हो महाराणा प्रताप ने प्रतिज्ञा लेकर अपने विश्वासपात्र सैनिको के साथ जंगलो में रहकर दुश्मनों को लोहे के चने चबवाना आरम्भ कर दिया । मेवाड़ पर आक्रमण हेतु मुगल सेनापति आमेर के राजा मान सिंह के नेतृत्व में निकली शाही सेना का सामना 18 जून 1576 को खमनोर गाँव से कुछ दूर एक तंग पहाड़ी दर्रे में मेवाड़ के सपूत महाराणा प्रताप से हो गया। भीषण रक्तपात मचा व दुश्मनों को मुँह की खानी पड़ी । मात्र चन्द घण्टों तक चले इस संग्राम से हल्दीघाटी का मुख्य रणक्षैत्र जो रक्त तलाई के नाम से पहचाना जाता है वह रक्त की एक ताल में बदल गया । संघर्षरत रहते हुए महाराणा प्रताप ने पुनः सितम्बर 1576 में गोगुन्दा पर अधिकार कर लिया व सन् 1586 में मांडलगढ़ एवं चितौड़गढ़ को छोडकर समूचे मेवाड़ राज्य पर पुनः विजय हासिल कर अपने शौर्य का लोहा मनवाया । माघ सुदी 11, विक्रम सम्वत् 1656 - दिनांक 19 जनवरी,1597 को 57 वर्ष आयु में चावण्ड गांव में स्वतन्त्रता के पुजारी महाराणा प्रताप ने आखिरी श्वास ली।

-: हल्दीघाटी का जनयुद्ध:-

मध्य कालीन भारत के इतिहास में स्वतन्त्रता के लिए लड़ने वाले अनेक महापुरुष हुए लेकिन महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी और गुरु गोविन्द सिंह के नाम उनमें अग्रणी हैं। राणा प्रताप के लिए स्वातन्त्रय धर्म था और उनके जीवन की यह टेक थी - ‘ जों ढृढ़ राखे धर्म को, तिही राखे करतार ’ - और इस टेक का स्वतन्त्रता को बनाए रखने के संकल्प को उन्हांेने भीषण परिस्थितियों में जिस दृढ़ता से निर्वाह किया उसने सारे भारत देश को अनुप्राणित किया। वे राजकुल में उत्पन्न हुए थे और उनके सामने अकबर और अपने ही भाई राजपूतों से अपनी स्वतन्त्रता बनाए रखनी की समस्या थी। उन्हांेने अपने राजपूत अनुयायियों में ही नहीं अपने राज्य के आदिवासी भीलों में भी स्वतन्त्रता प्रेम की ऐसी अग्नि प्रज्वलित कर दी कि वे अपने समय के संसार के सबसे शक्तिशाली सम्राट अकबर से आजीवन लोहा ले सके । कर्नल टाॅड ने उनके इस आजीवन युद्ध का जो वर्णन किया है वह उनकी महानता का परिचय देता है । महाराणा प्रताप के ऐतिहासिक एवं शौर्य पूर्ण हल्दीघाटी युद्ध का वर्णन करने से पहले यह उचित होगा कि उनके जीवन से जुड़े घटनाक्रम का संक्षिप्त परिचय कराया जाए। महाराणा संग्रामसिंह (सांगा) महाराणा प्रताप के पिता महाराणा उदय सिंह के पिता थे। महाराणा सांगा भी महाराणा प्रताप की तरह युद्ध करते रहे ओर अपने देश का नाम उज्जवल बनाए रखा, इनकी रानी का नाम कर्मवती था जिसने अपने देश सम्मान के लिए रानी पद्मनी की तरह चितौड़ में जौहर कर अपने सतीत्व के नाम की छाप अंकित की थी । महाराणा सांगा के तीन पुत्र थे। जिनके नाम रतन सिंह, विक्रमादित्य और उदय सिंह थे। महाराणा सांगा की मृत्यु के पश्चात् ज्येष्ठ पुत्र रतन सिंह गद्दी पर बैठा लेकिन वह निःसन्तान था अतः इनके बाद गद्दी पर विक्रमादित्य बैठा। उस समय चितौड़ की स्थिति अच्छी नहीं थी । राजपूत लोग उसकी अयोग्यता के कारण अपने अपने ठिकाने पर चले गये थे। महाराणा विक्रमादित्य बाहरी आक्रमणों का मुकाबला नहीं कर सकता था। अतएव रानी कर्मवती ने सब सरदारों को पत्र लिखवाए कि अब तक तो चितौड़ पर राजपूतों का अधिकार है अब हाथ से चला जावेगा । आपका महाराणा अयोग्य है, यदि चितौड़ शत्रु के हाथ में चला गया तो राजपूत जाति की कीर्ति जाती रहेगी। पत्र के मिलते ही सब सरदार उपस्थित हुए । विक्रमादित्य और उदय सिंह को बूंदी भेज दिया गया। प्रताप गढ़ के रावत बाघ सिंह को राणा का प्रतिनिधि नियुक्त किया गया। रावत बाध सिंह ने डटकर बहादुरशाह की सेना का मुकाबला किया, लेकिन बाहदुरशाह के पास सेना अधिक होने से चितौड़ पर बहादुरशाह का आधिपत्य हो गया। इस घटना के बाद रानी कर्मवती का मुँह बोला भाई दिल्ली का बादशाह हुमायूं रानी कर्मवती की रक्षा के लिए चितौड आया और उसने बहादुरशाह की सेना को चितौड़ से मार भगाया। ऐसी परिस्थिति में राजपूतों ने पुनः चितौड़ पर अपना अधिकार कर लिया और विक्रमादित्य को पुनः महाराणा घोषित किया, लेकिन विक्रमादित्य अपने स्वभाव में कोई परिवर्तन न कर सका । ऐसी परिस्थिति को देख कर महाराणा सांगा के औरस पुत्र बनवीर महाराणा का प्रधानमंत्री बन गया। विक्रमादित्य की कमजोर स्थिति को भाँपते हुए एक दिन रात्रि को मौका पाते ही बनवीर ने महाराणा विक्रमादित्य को मार दिया और मेवाड़ राजवंश के अन्तिम वारिस उदय सिंह को मारने जा पहुँचा परन्तु स्वामी भक्त धाय माँ पन्ना को इसका पता चल गया उसने उदय सिंह की बजाए अपने स्वयं के पुत्र चन्दन की राजसी वेषभूषा पहना कर उदय सिंह के स्थान पर सुला दिया व अपने कलेजे के टुकडे की प्राणाहुती देकर मेवाड़ राजवंश के प्राण बचाए और उसे लेकर आशा शाह के पास पहुँच गई । इधर बनवीर से भी सरदार लोग खुश नहीं थे, सरदार लोग उसे अपना स्वामी नहीं मानते थे अपना स्वामी उदय सिंह को ही मानते थे। कुछ वर्ष पश्चात् सरदारों ने उदय सिंह के बालिग होते ही चितैाड़ पर आक्रमण कर दिया , बनवीर सिंह युद्ध में मारा गया। महाराणा उदय सिंह ने ही मौजूदा उदयपुर नगर की स्थापना की थी लेकिन वह भी कुशल व योग्य शासक नहीं था। उधर मुगल साम्राज्य का स्वामी अकबर बहुत ही चतुर और प्रबल था, उसने गद्दी पर बैठने के पश्चात राजपूतों के साथ मित्रता का हाथ बढ़ाया, उनको दिल्ली आमन्त्रित किया और उनसे सम्बन्ध स्थापित कर उनकी लड़कियो से विवाह भी किये, लेकिन मेवाड़ के राणा ने उसके निमन्त्रण एवं अधीनता को अस्वीकार किया । इस कारण से अकबर ने चितौड़ पर आक्रमण कर दिया। महाराणा उदय सिंह उसका सामना करने में असमर्थ रहा जिससे चितौड़ शत्रु के हाथ मे चला गया, पराजित महाराणा उदयसिंह चितौड़ छोड़ कर चला गया। महाराणा उदय सिंह के कई पुत्र थे जिनमें सबसे बडा पुत्र प्रताप सिंह था लेकिन महाराणा उदय सिंह ने अपने अयोग्य छोटे पुत्र जगमाल को राज गद्दी दी वह अनुचित थी। अतः सरदारो ने राणा प्रताप को गद्दी के योग्य समझा व महाराणा उदय सिंह की मृत्यु के पश्चात प्रताप को ही गद्दी का उत्तराधिकारी बनाया, राज तिलक के चार वर्ष के बाद ही महाराणा प्रताप को हल्दीघाटी के महासमर में जूझना पडा और जीवन पर्यन्त मुगलों की पराधीनता से एक एक किले को मुक्त कराने में लड़ते रह कर 57 वर्ष की कम आयु में ही चावंड में अपना प्राण त्यागा । महाराणा प्रताप को बिहारीमल और मानसिंह ने अकबर की अधीनता स्वीकार करने के लिए बहुत ही समझाया लेकिन उन्होने अधीनता स्वीकार नहीं की और ना ही अपने उत्साह को कम होने दिया । उन्होंने बडी धीरता और दृढ़ता के साथ काम लेकर अपनी राजधानी कुम्भलगढ़ नामक कस्बे में रखी। अकबर बराबर यह चेष्टा कर रहा था, कि महाराणा उसकी अधीनता स्वीकार कर लें उनको समझाने के लिए बहुत प्रयत्न किये लेकिन वह असफल रहा । अकबर ने मान सिंह के साथ एक बड़ी शाही सेना देकर उदयपुर को अपने अधिकार में लेने के लिए भेजा, अकबर ने मानसिंह को यह भी कह दिया कि जो अपनी अधीनता स्वीकार कर लें उसके साथ सम्मान पूर्वक व्यवहार किया जाए परन्तु जो अधीनता स्वीकार नही करे उसका दमन कर दिया जाए। राजा मानसिंह ने सबसे पूर्व डूंगरपुर राज्य में प्रवेश किया लेकिन वह मान सिंह का सामना नहीं कर सका अन्त में उन्हें अकबर की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी, इसके पश्चात् वह महाराणा प्रताप से मिलने के लिए गया, प्रताप ने मानसिंह का स्वागत किया और अकबर के द्वारा भेजे हुए सन्देश को शान्ति पूर्वक सुना। राजा मानसिंह को महाराणा ने उदयसागर पर भोज के लिए आमन्त्रित भी किया किन्तु महाराणा स्वयं भोज में सम्मिलित नहीं हुए और उन्होने अपने पुत्र के साथ यह समाचार भेजे कि ‘मेरे पेट में दर्द है’ इस बात पर राजा मानसिंह बहुत क्रोधित हुआ । राजा मानसिंह बिना भोजन किये हुए ही चला गया, जाते समय उसने महाराणा को यह सन्देश भिजवा दिया कि इस पेट दर्द का इलाज शीघ्र कर दूंगा। यही क्रोध आगे जाकर ‘हल्दीघाटी’ के ऐतिहासिक युद्ध का कारण बना । राजा मानसिंह के इस क्रोध की महाराणा ने कोई परवाह नही की और उल्टा उसके जाने के बाद उस स्थान की सफाई कराई व गंगा जल छिटकवाया। जिन बर्तनो में भोजन बनवाया था उन्हें भी तुड़वा दिया। राजा मानसिंह ने वापस आकर अकबर को उपरोक्त हाल सुनाया तो वह आग बबूला हो गया । राजा मानसिंह भी अपने इस अपमान का बदला लेना चाहता था । इधर महाराणा प्रताप भी अपनी शक्ति बढ़ा रहा था, अपने आसपास के कुछ इलाके जो अकबर के अधीन हो गये थे, उनको फिर से अपने अधिकार में कर लिये । अकबर मेवाड़ को जीतने का पूरा प्रयत्न कर रहा था। वह जानता था कि जब तक मेवाड़ पर पुरा आधिपत्य नहीं कर लेता तब तक उसकी सत्ता अपूर्ण रहेगी। राजा मानसिंह बराबर महाराणा प्रताप के विरूद्ध अकबर को उकसाया करता था। महाराणा को दबाने के लिए अकबर ने मेवाड़ की सीमाओं से सटे क्षैत्रों को प्रताप के विरोधी निकट सम्बन्धियों को दे कर दबाव बनाना आरम्भ कर दिया, अकबर को यह विश्वास था कि इस प्रकार दबाव बनाने से प्रताप घबरा जाएगा व मुगल अधीनता स्वीकार कर लेगा, लेकिन माटी का पुजारी प्रताप कब दबने वाला था, वह मामूली व्यक्त्वि नहीं था। अकबर की जो आशा थी वह पूर्ण नही हो सकी, अन्त में अकबर ने 3 अप्रेल 1576 ई. को राजा मानसिंह के नेतृत्व में सेना देकर प्रताप से लड़ने के लिए भेजा । राजा मानसिंह ने अपनी सेना का केन्द्र माण्डलगढ़ रखा और गोगून्दा में जाने के लिए दो मार्ग खोजे। पहला मार्ग देबारी से उदयपुर व गोगून्दा, दूसरा मार्ग बनास नदी के सहारे खमनोर गांव में होकर जाने वाला, जो गोगून्दा के उत्तर पूर्व की ओर 16 मील दूर स्थित है। इस मार्ग में जल का अभाव नहीं था अतएव वह इसी मार्ग से रवाना हुआ । जब प्रताप ने सुना कि राजा मानसिंह एक बड़ी फौज लेकर मौजूदा राजधानी गोगून्दा पर आक्रमण करने के लिए मोलेला में बनास के उत्तर में पड़ाव डाल चुका है। प्रताप भी गोगुन्दा से चल कर मुगलो से 6 मील दूर लोसिंग गाँव पहुँच गये। एक दिन पूर्व गुप्तचरों ने प्रताप को सूचना दी कि मानसिंह कुछ सैनिकों के साथ शिकार करने के इन जंगलो में आया हुआ है, हमले का अच्छा अवसर है। महाराणा ने कहा कि इस प्रकार छल कपट से शत्रु को हराना क्षत्रियों का धर्म नहीं है। विश्व प्रसिद्ध हल्दीघाटी का शौर्य पूर्ण संग्राम भारतीय इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है व आज भी शूरमाओं की प्रेरणा का अमर स्त्रोत है । विश्व प्रसिद्ध हल्दीघाटी युद्ध यहीं से प्रारम्भ होता है। 18 जून 1576 की सुबह राजा मानसिंह के नेतृत्व वाली शाही सेना खमनोर के नजदीक एक तंग पहाड़ी दर्रे से गोगुन्दा की तरफ गुजरने वाली थी। यह दर्रा इतना संकडा था जिसमें एक समय में सिर्फ एक घुड़सवार सैनिक ही गुजर सकता था। इस लम्बे पहाड़ी दुर्गम दर्रे में प्रवेश करती शाही सेना पर महाराणा प्रताप के सेनापति हाकिम खान ने 800 अफगान घुड़सवारों को लेकर युद्ध का धावा बोल दिया, राणा कीका भी रण बाँकुरी सेना के साथ निकल कर हाकिम खान के साथ आ गया । भयानक काँटेदार पहाड़ी क्षेत्र से तीरों व पत्थरों की बौछारें होने लगी। इस अप्रत्याशित आक्रमण से शाही सेना का अग्रिम भाग बुरी तरह परास्त हुआ। आक्रमण से मुगल सेना में हडकम्प मच गया व लडखड़ाती फौज वहाँ से हार कर भेड़ों की तरह दूर बनास नदी को पार कर मोलेला की ओर भाग खड़ी हुई । एक बार तो ऐसा लगने लगा कि महाराणा प्रताप ने युद्ध में विजयश्री हासिल कर ली हैं । महाराणा प्रताप स्वयं युद्ध के दौरान मेवाड़ी सेना के केंद्र में रह कर कमान सम्भालें हुए थे। उनकी सैन्य व्यूह- रचना में दाहिनी ओर ग्वालियर नरेश रामशाह तंवर व उनके तीन पुत्र शालीवाहन, भवानीसिंह, प्रतापसिंह, भामा शाह व उनके भाई ताराचंद आदि थे। वहीं बाई तरफ सादड़ी ठिकाने के झाला मान सिंह ( बीदा ), जैत सिंह राजावत, मानसिंह सोनगरा आदि थे । हरावल में लावा सरदारगढ़ के भीमसिंह डोड़िया, पठान हाकिम खाँ सूरी, रावत कृष्णदास चूंडावत, राठौड़ रामदास,रावत सांगा आदि रहे जबकि चन्दावल में भील सरदार मेरपुर के राणा पुंजा, पुरोहित गोपीनाथ, पुरोहित जगन्नाथ, पड़िहार कल्याण, जयमल्ल, रत्नचंद, जैसा और केशव चारण आदि थे। शाही सेना को दयनीय स्थिति में भागते देखकर अकबर की सुरक्षित शाही लश्कर का सरदार मेहतर खान जो मोलेला के नजदीक सोलह सरदारों के छापर नामक स्थान पर पड़ाव डाले हुए था, उसने ढोल बजा कर चिल्लाते हुए सेना के साथ युद्धक्षेत्र की तरफ बढ़ना आरम्भ किया व झूठी अफवाह फैला दी कि शंहशाह स्वयं युद्ध करने आ चुके है। इस झूठी अफवाह से युद्ध में अचानक बदलाव आ गया। भागते मुगल सैनिक खमनोर के खुले मैदान में पुनः युद्ध करने लगे । राजपूती सेना में इससे खलबली मच गई। खमनोर के मैदानी भाग रक्त तलाई में भयंकर मार काट से चारो ओर लाशें गिरने लगी । दोनो सेना के योद्धाओं को अपने जीवन की चिन्ता नहीं थी। महाराणा के नेतृत्व वाली सेना मे हजारों घुड़सवार सैनिक, धर्नुधारी आदिवासी, पैदल भील सैनिक व लड़ाकू हाथी शामिल थे। पैदल सैनिकों की लड़ाई पश्चात् दोनो सेनाओं के हाथियों की लडाई शुरू हुई, महावत की जगह पर बैठकर राजा मानसिंह स्वयं एक बड़े हाथी पर सवार हो प्रताप से लड़ने आया। हाथी भी पुरुषों की भाँति वीरता पूर्वक चिंघाड कर लड रहे थे। महाराणा प्रताप की सेना में ‘लूण‘ व ‘रामप्रसाद ’ नामक हाथी शत्रुओं को मारने में बहुत ही कुशल थे, उन्हांेने शाही सेना के मुक्ता नामक हाथी सहित कई शाही हाथियों को मार भगाया । चेतक घोड़े पर सवार हो जब महाराणा प्रताप ने राजा मान सिंह के ऊपर बडे ही वेग से अपने भाले द्वारा हमला किया तब चेतक के अगले दो पैर राजा मानसिंह के हाथी की सूंड पर जा टिके थे। राजा मानसिंह महावत के पीछे हौदे में छुप गया व महावत मारा गया । इस हमले के दौरान शाही हाथी की सूंड में लगी तलवार से चेतक का पिछला बाँया पैर कट गया । उस समय महाराणा प्रताप शाही सैनिकों द्वारा चारो ओर से घेर लिये गये । महाराणा पर तीरो की वर्षा होने लगी व यकायक शाही सेना जीतने लगी। शाही सेना मे रण नाद और हर्ष ध्वनि गुंज रही थी । प्रताप घायल होकर भी बहादुरी से शाही सैनिकों का सामना कर रहे थे। मेवाड़ी सेना की रणनीति मे बदलाव करना पडा। क्योंकि मातृभूमि के स्वाभिमान व प्रतिष्ठा को बनाये रखने के लिये महाराणा प्रताप को बचाना आवश्यक था । सुरक्षा की नीति अपनाते हुए महाराणा को युद्ध क्षैत्र से निकल जाने का निवेदन किया गया लेकिन प्रताप युद्ध क्षेत्र से निकलने को किसी भी कीमत पर तैयार नही हुए । उसी समय झाला मान सिंह ने अपूर्व साहस का परिचय दिया, उसने महाराणा का मेवाड़ी छत्र और मुकुट स्वयं धारण कर लिया और मैं महाराणा हूँ , मैं महाराणा हूँ , यह चिल्लाते हुए युद्ध करने लगा। इस घटना से मुगल सैनिकों का ध्यान प्रताप के हमशक्ल से लगने वाले झाला मान पर केन्द्रित हो गया। झाला मान शाही सेना को पूर्व दिशा में मोडने में कामयाब हो गये। मौका देख कर हाकिम खान सूरी ने चेतक की लगाम थामते हुए भामाशाह के पास जाकर प्रताप को सुरक्षित निकालने को कहा । महाराणा को कहा गया कि आप निश्चिन्त होकर जाये हम शत्रुओं को आगे नही बढने देंगे व प्राण रहते लड़ते रहेंगे। महाराणा प्रताप को वहाँ से सुरक्षित निकाल दिया गया । महाराणा प्रताप की रक्षा करने के बाद झाला मान, हाकिम खान सूरी, रामशाह तँवर सहित कई यौद्धा वीरतापूर्वक लड़ते हुए आत्म बलिदान कर गये । समूचा युद्ध क्षेत्र रक्त के ताल में बदल गया। यहाँ बने हुए स्मारकों के कारण रक्त तलाई विश्व विख्यात जनयुद्ध का आज भी स्मरण कराती हैं। ऐसा कहा जाता हैं कि बरसों पूर्व खमनोर का माना तालाब भी झाला मान की स्मृति में ही बना था। प्रताप अपने घोड़े सहित पहाडियों के पीछे चले गये। प्रताप के जाने के बाद अकबर के पुत्र सलीम को जब ज्ञात हुआ कि महाराणा की सेना द्वारा धोखा दिया जा रहा हैं। महाराणा यहाँ पर नहीं हैं और वह चला गया हैं । अतः सलीम ने मुलतानी और खुरासानी नामक दो सैनिकों को महाराणा प्रताप की खोज में सम्भावित मार्ग पर पीछे लगा दिया । जब इस बात का पता महाराणा प्रताप के छोटे भाई शक्ति सिंह को लगा जो उस समय अकबर की तरफ से लड़ रहा था। शाही सेना में शामिल होने का कारण सिर्फ महाराणा प्रताप और शक्ति सिंह के बीच बचपन में शिकार करते हुए झगड़ा हो गया था इस कारण से वह नाराज होकर अकबर से जा मिला था । लेकिन उस समय वह शत्रुओ के द्वारा मेवाड़ की पराजय देख न सका क्योंकि उसके शरीर में भी राजपूती लहू दौड़ रहा था। उसके हृदय परिवर्तन से उसका भातृत्व भाव जाग उठा, स्वाभिमान और देश भक्ति के कारण वह अपने आप को रोक नही पाया। वह युद्ध क्षेत्र को छोड़कर तेजी के साथ अपने घोड़े नाटक पर महाराणा का पीछा करने वाले सैनिकों की तरफ बढ़ा । अपने घोड़े नाटक से वह शीघ्र ही उन घुड़सवारों तक पहुँच गया और नजदीक पहुँचते ही दोनो को मार गिराया । मुगल सैनिकों को मार कर शक्ति सिंह आगे बढ़ा और एक टेकरी पर जाकर महाराणा को खोजने लगा। उसे सामने ही प्रताप चेतक पर जाते हुए नजर आए। शक्ति सिंह ने प्रताप को ‘ओ नीला घोड़ा रा असवार’ ‘ओ नीला घोड़ा रा असवार’ कहते हुए तीन चार बार पुकारा । यह आवाज सुन प्रताप ने ठहर कर जब अपने विरोधी भाई को पीछे आता हुआ देखा तो एकबारगी उनके मन में शंका उत्पन्न हुई। प्रताप समझे कि शक्तिसिंह अपने बैर का बदला लेने के लिए मेरे पीछे आ रहा है, घायल घोड़े चेतक ने तीन टाँगो से एक गहरे चौडे नाले को छलांग लगा दी थी। महाराणा प्रताप दृढ़ता के साथ अपने घोड़े चेतक से उतरे। शक्तिसिंह प्रताप के समीप आते ही चरणो में गिर पड़ा और क्षमा याचना की। यहाँ दोनो भाईयों का पुनः मिलन हुआ। प्रताप अपने घोड़े चेतक के प्रति बहुत स्नेह रखते थे क्योंकि कई अवसरो पर उसने बहादुरी का प्रदर्शन किया था व अन्त में घायल होते हुए भी रक्त तलाई से भंयकर पहाड़ी रास्ते होकर उन्हे सुरक्षित स्थान तक ले आया। खोड़ी इमली के नीचे अपने स्वामी को सुरक्षित देख स्वामी भक्त मूक अश्व चेतक ने प्राण त्याग दिये। दोनो भाईयों ने नम आँखो से मरे हुए चेतक को उठाकर कुछ दूरी पर गाड़ दिया । जहाँ आज भी शिव मंदिर व स्मारक बना हुआ हैं। यह स्थल चेतक समाधी के नाम से विश्व विख्यात हैं। शक्ति सिंह ने अपने बडे भाई महाराणा प्रताप को अपना घोड़ा नाटक देकर गोगून्दा की तरफ विदाई देते हुए कहा कि अवसर मिलने पर मैं आपके पास पुनः लौट आऊँगा । शक्ति सिंह के ये शब्द सुन प्रताप गोगुन्दा की ओर प्रस्थान कर गये। युद्ध समाप्त होने पर शक्ति सिंह को सलीम ने पूछा कि प्रताप का क्या हुआ ? उसने जवाब दिया कि प्रताप ने ना सिर्फ दोनो सैनिको को ही मार गिराया बल्कि मेरे घोड़े नाटक को भी मार डाला। ऐसी स्थिति में मुझे सैनिकों का घोड़ा लेकर आना पड़ा। इस जवाब से सलीम को सन्देह हो गया । शक्ति सिंह से सलीम ने प्रण करते हुए कहा कि अगर तुम मुझे सच सच बता दोगे तो मैं तुम्हे क्षमा कर दूँगा । शक्ति सिंह ने उत्तर दिया कि ‘ मेवाड़ के राज्य का उत्तरदायित्व मेरे भाई के कन्धों पर है और मैं संकट के क्षणों में उनकी सहायता किये बिना कैसे रह सकता था। ’ सलीम ने अपनी प्रतिज्ञा का पालन किया और उसने शक्ति सिंह को शाही सेना छोड कर चले जाने की आज्ञा दी। शक्ति सिंह वहाँ से जाकर पुनः महाराणा प्रताप से मिल गया । हल्दीघाटी युुद्ध दौरान सैन्य व्यूह रचना मेवाड़ी सेना का पडाव कुम्भलगढ़ से गोगुन्दा व लोसिंग झोझावल (केन्द्र) महाराणा प्रताप दाहिनी तरफ ग्वालियर नरेश रामशाह तंवर व उनके तीन पुत्र शालीवाहन, भवानीसिंह, प्रतापसिंह, भामा शाह व उनके भाई ताराचंद आदि। बाईं तरफ सादड़ी ठिकाने के झाला मान सिंह ( बीदा ), जैत सिंह राजावत, मानसिंह सोनगरा आदि । हरावल में लावा सरदारगढ़ के भीमसिंह डोड़िया, पठान हाकिम खाँ सूरी, रावत कृष्णदास चूंडावत, राठौड़ रामदास,रावत सांगा आदि। चन्दावल में भील सरदार मेरपुर राणा पुंजा, पुरोहित गोपीनाथ, पुरोहित जगन्नाथ, पड़िहार कल्याण, जयमल्ल, रत्नचंद, जैसा और केशव चारण आदि । शाही सेना का पडाव माण्डल गढ़ से मोही एवं मोलेला केन्द्र मिर्जा मान सिंह चूज़ाहाशिम बराह आदि । दाहिनी तरफ सैय्यद अहमद खाँ आदि । बाईं तरफ गाजी खाँ बख्शी, लूण कर्ण आदि । हरावल में जगन्नाथ कछवाहा एवं आसफ खाँ आदि । चन्दावल में मिहतर खाँ आदि । -: हल्दीघाटी युद्ध की ऐतिहासिक महत्ता:- ऐतिहासिक हल्दीघाटी के युद्ध से यह ज्ञात होता हैं कि महाराणा का पक्ष प्रबल रहा और राजा मानसिंह इस युद्व के पश्चात कितने ही दिनो तक डरता रहा। यह चिन्तन का विषय है कि महाराणा प्रताप एक छोटे प्रदेश का महाराणा थे उनके पास गिने चुने स्वामी भक्त सामन्त ही थे। चित्तौड़ विजय के पश्चात अकबर ने मेवाड़ के उपजाऊ भाग पर अधिकार कर लिया था। मेवाड़ के केवल पश्चिमी भाग पर महाराणा प्रताप का अधिकार था जो पहाड़ी और वीरान था लेकिन महाराणा ने अपनी छोटी सी सेना लेकर विशाल शाही सेना का सामना किया । इसमें आश्चर्य की बात यह है कि महाराणा की सेना ने शाही सेना को तितर बितर कर कई मीलों तक खदेड़ दिया था। मेहतर खान के आ जाने से महाराणा की विजयश्री होते हुए भी स्थिति एकदम परिवर्तित हो गई और महाराणा प्रताप को पीछे हटना पडा । महाराणा प्रताप के शौर्य से मुगलों को निर्णायक जीत हासिल नही हो सकी थी इस कारण से ही हल्दीघाटी युद्ध हिन्दुस्तान का राष्ट्रीय संग्राम कहलाया व यह वीरभूमि ऐतिहासिक पवित्र तीर्थ स्थल बन गई ।

हल्दीघाटी चेतक नाला

”“ जब तक मैं शत्रुओं से अपनी पावन मातृभूमि को मुक्त नही करा लेता, तब तक न तो मैं महलों में रहूंगा, न शैय्या पर सोऊंगा और न सोने चांदी अथवा किसी धातु के पात्र में भोजन करुंगा । वृक्षों की छांव ही मेरे महल, घास ही मेरा बिछौना और पत्ते ही मेरे भोजन करने के पात्र होगें । ”” - प्रताप प्रतिज्ञा