भारतवर्ष में मेवाड़ के महान सपूत प्रातःस्मरणीय, वीर शिरोमणी महाराणा प्रताप का नाम मातृभूमि के अमर सैनानी के रूप में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। हल्दीघाटी का जनयुद्ध इतिहास का वह स्वर्णिम अध्याय है, जिसके स्मरण मात्र से भारतीय पराधीनता के कालचक्र में कई देश भक्तों को प्रेरणा मिली। मेवाड़ पर मुगल आक्रमण के समय स्वाधीनता को बचाये रखते हुए मातृभूमि की वेदी पर महाराणा प्रताप द्वारा आयोजित इस पावन यज्ञ में हाकिम खाँन सूरी, झाला मान सिंह, भीलू राणा, ग्वालियर नरेश रामशाह तँवर, भामाशाह सहित अगणित यौद्धाओं ने मेवाड़ की आन, बान, शान के खातिर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। मूक अश्व चेतक ने अपने प्राणों की आहुति देकर स्वामी भक्ति का अनुपम उदारहण प्रस्तुत किया।
अरावली पर्वतमाला की गोद में स्थित हल्दीघाटी मेवाड़ का विश्व प्रसिद्ध रणक्षेत्र है। स्वतन्त्रता प्रेमियों के लिए अजर अमर प्रेरणा की स्त्रोत यह रणभूमि, जिसकी तीर्थ यात्रा कर स्वतन्त्रता के पुजारियों का मस्तक महाराणा प्रताप और उनके स्वामी भक्त अश्व चेतक सहित मेवाड़ी सेना में भाग लेने वाले शूरमाओं एवं आदिवासीयों (भीलों) के प्रति श्रद्धा से अवनत हो उठता हैं।
*18 जून: हल्दीघाटी शौर्य दिवस*
*हल्दीघाटी-खमनोर युद्ध के 450वें वर्ष में वीर पुरखों की अमर गाथा*
18 जून 1576 का दिन भारतीय इतिहास में केवल एक युद्ध की तिथि नहीं है। यह वह दिन है जब मेवाड़ की धरती पर राष्ट्र के स्वाभिमान की रक्षा के लिए तीन पीढ़ियों ने एक साथ अपना रक्त बहाया था। हिंदूवा सूर्य महाराणा प्रताप की वीरता आज देश के कोने-कोने में गूंजती है, परंतु उस गौरव के पीछे उन अनगिनत बलिदानियों का त्याग है जिन्हें राष्ट्र कभी भूल नहीं सकता।
हल्दीघाटी का युद्ध केवल मेवाड़ बनाम मुगल नहीं था। यह भारत के आत्मसम्मान की लड़ाई थी जिसमें चंबल घाटी से लेकर अरावली तक के वीर एकजुट हुए थे। ग्वालियर के तोमर वंश के महाराजा रामसिंह तोमर 1558 में मुगलों से संघर्ष के बाद स-परिवार चित्तौड़ आए। महाराणा उदयसिंह ने उन्हें 'शाहों का शाह' कहकर 'राजा रामशाह तोमर' की उपाधि से सम्मानित किया। मेवाड़-ग्वालियर की पुरानी वैवाहिक परंपरा को निभाते हुए उदयसिंह ने अपनी बेटी, प्रताप की बहन लीला कुवंर का विवाह रामशाह के ज्येष्ठ पुत्र राजकुमार शालीवाहन से किया। यह केवल दो परिवारों का नहीं, दो संकल्पों का मिलन था।
बाद में रामशाह के छोटे पुत्रों भवानी सिंह और प्रताप सिंह के लिए अन्यत्र से विवाह प्रस्ताव आए। रामशाह ने उन्हें यह कहकर ठुकरा दिया कि "मैं चंबल घाटी से यहां वैवाहिक रिश्ते करने नहीं आया हूं, बल्कि राष्ट्र में मुगल सल्तनत के विस्तार को रोकने, मेवाड़ के स्वाभिमान को बरकरार रखने, प्रताप के गौरव को अक्षुण्ण रखने और मुगल सल्तनत को मेवाड़ की वीर भूमि से दूर रखने आया हूं।" यह वाक्य बताता है कि हल्दीघाटी में लड़ने वाले योद्धा केवल सैनिक नहीं, राष्ट्रवाद के पुरोधा थे।
18 जून 1576 को खमनोर के मैदान में जब युद्ध आरंभ हुआ तो प्रताप की सेना तीन भागों में थी। मुख्य सेनापति स्वयं महाराणा प्रताप थे। बाएं भाग का नेतृत्व हकीम खान सूर कर रहे थे और दाएं भाग के प्रधान सेनापति राजा रामशाह तोमर थे। इतिहास साक्षी है कि पहला प्रहार दाएं भाग के राजपूतों ने ही किया। उनके शौर्य से अकबर की सेना के बाएं भाग के बरहा के सैय्यद युद्ध छोड़कर खुले मैदान में आ गए। लड़ाई रक्त तलाई और बनास नदी के किनारे तक पहुंची। ऐसा भयानक युद्ध हुआ कि धरती वीरों के रक्त से लाल हो गई और वह स्थान 'रक्त तलाई' कहलाया।
इस युद्ध में राजा रामशाह तोमर ने अपने ज्येष्ठ पुत्र मेवाड़ के दामाद राजकुमार शालीवाहन, दो अन्य पुत्रों भवानी सिंह और प्रताप सिंह तथा शालीवाहन के 16 वर्षीय पुत्र बलभद्र सिंह के साथ वीरगति पाई। बलभद्र प्रताप का भांजा और महाराणा उदयसिंह की बेटी का बेटा था। चंबल घाटी के लिए यह गौरव का विषय है कि ग्वालियर के राजा ने तीन पीढ़ियों के साथ एक ही दिन, एक ही स्थान पर, एक दूसरे की आंखों के सामने मेवाड़ की धरती के लिए बलिदान दिया। तीन पीढ़ी, एक दिन, एक स्थान, एक साथ देवलोक वासी हो गईं। यह राजपूताना की आन और शान का सर्वोच्च उदाहरण है।
युद्ध समाप्ति पर महाराणा उदयसिंह की बेटी, प्रताप की बहन, राजकुमार शालीवाहन की धर्मपत्नी, कुंवर बलभद्र की माता, रामशाह की पुत्रवधू और ग्वालियर की युवरानी लीला कुवंर ने अपने ससुर, पति, देवरों और पुत्र के शवों को जिस धैर्य से देखा, उसकी कल्पना भी हृदय को कंपा देती है। उन्होंने पति का सिर गोद में लेकर अग्नि स्नान किया। वह क्षण वीरता और करुणा का संगम था जिसने मेवाड़ की मिट्टी को और पवित्र कर दिया।
रामशाह के साथ भदौरिया, सिकरवार, जादौन, परमार वंश के सैकड़ों राजपूत योद्धा भी आए थे और सभी ने बलिदान दिया। हल्दीघाटी का युद्ध बताता है कि मेवाड़ की रक्षा में पूरा भारत खड़ा था।
इस युद्ध में ब्राह्मण समाज का योगदान भी अमर है। ब्राह्मण केवल शास्त्र का नहीं, शस्त्र का भी धनी रहा है। राजपुरोहित नारायण दास पालीवाल के दो पुत्रों सहित जगन्नाथ पुरोहित और गोपीनाथ पुरोहित ने भी मेवाड़ के लिए प्राण दिए। उनकी विधवाओं ने भी सतीत्व का पालन किया। आज भी खमनोर में ब्राह्मणों की सती माताओं के चबूतरे उस त्याग के मौन साक्षी हैं।
हल्दीघाटी में राजपूत, ब्राह्मण, भील, चारण, रावत, पठान सभी लड़े। राणा पूंजा भील के बिना मेवाड़ की रक्षा अधूरी थी। इसलिए 18 जून को केवल एक वर्ग नहीं, समूचे समाज को रक्त तलाई व नजदीक स्थित श्री चारभुजा नाथ के मंदिर में दीपक लगाकर अपने पुरखों को नमन करना चाहिए। यही हमारी साझी धरोहर है।
इतिहास कहता है कि जब ब्राह्मण ने मार्गदर्शन दिया, क्षत्रिय ने रक्त बहाया, वैश्य ने संसाधन दिए और शूद्र ने श्रम किया, तभी राष्ट्र खड़ा रहा। जब यह संतुलन बिगड़ा, देश कमजोर हुआ। आज तलवार का युग नहीं है। आज कलम, विज्ञान और तकनीक का युग है। जिनके पूर्वज तलवार के धनी थे, उनके वंशज कलम के धनी क्यों नहीं हो सकते? आवश्यकता केवल अपनी शक्ति पहचानने की है।
18 जून बलिदान दिवस है। यह दिन हमें पढ़ने, सोचने और विचार करने का आह्वान करता है।
महाराणा प्रताप, राजा रामशाह तोमर, हकीम खान सूर, राणा पूंजा भील, जगन्नाथ पुरोहित, गोपीनाथ पुरोहित सहित अनेक बलिदानियों ने हमें जो स्वतंत्रता दी है, उसका ऋण हमें राष्ट्र निर्माण से चुकाना है।
उठो, जागो और स्वयं को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करो। क्योंकि रक्त तलाई की मिट्टी आज भी पूछती है कि क्या हम उन बलिदानियों के योग्य उत्तराधिकारी बन पाए हैं?