मेवाड़ के स्वाभिमान की रक्षार्थ जनयुद्ध
इतिहास जानें
"मेवाड़ी महामंत्र है सब ग्रंथन को सार
जो दृढ़ राखे धर्म को तिही राखे करतार।"
राजसमंद जिले का गौरव “हल्दीघाटी” महान योद्धा महाराणा प्रताप के शौर्य और पराक्रम के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। उदयपुर से 44 किलोमीटर तथा नाथद्वारा से 17 किलोमीटर दूर अरावली पर्वतमाला के मध्य स्थित यह संकरा, हल्दी के रंग जैसा पीला पर्वतीय क्षेत्र मेवाड़ की आन-बान-शान की रक्षा में अपनी ऐतिहासिक भूमिका के कारण “हल्दीघाटी” कहलाता है। जब मुगल सेनापति ने इस क्षेत्र पर आक्रमण किया, तब महाराणा प्रताप के नेतृत्व में राजपूत सेना ने उसे पराजित कर पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। गुरिल्ला युद्ध नीति का प्रयोग करते हुए राजपूतों ने मुगल सेना को बादशाह बाग से खदेड़कर रक्त तलाई (खमनोर गाँव) के खुले मैदान तक पहुँचा दिया। खुले मैदानों में युद्ध करने की आदी मुगल सेना ने प्रताप की सेना से भीषण युद्ध किया, जिसका परिणाम निर्णायक नहीं रहा। युद्ध के दौरान महाराणा प्रताप अपने प्रिय अश्व “चेतक” पर सवार होकर मानसिंह पर भाले से टूट पड़े। इस आक्रमण में हाथी का महावत मारा गया, जबकि मानसिंह किसी तरह बच निकला। इसी संघर्ष में हाथी की सूंड में बंधी तलवार से चेतक के पिछले पैर में गंभीर चोट लग गई, जिससे स्थिति अत्यंत संकटपूर्ण हो गई। बड़ी सादड़ी के झाला मान ने युद्धभूमि में घायल होकर भी वीरता से लड़ रहे महाराणा प्रताप से राजचिह्न लेकर उन्हें सुरक्षित युद्धक्षेत्र से निकल जाने के लिए विवश किया। झाला मान स्वयं युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए, किंतु उन्होंने मुगल सेना को पूर्व दिशा की ओर पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। आज भी “माना तालाब” इस बलिदान की स्मृति को जीवित रखे हुए है। घायल चेतक महाराणा प्रताप को लेकर पर्वतीय मार्गों से दौड़ता हुआ बालिचा गाँव के निकट एक नाले को लांघकर पार ले गया। अपने स्वामी को सुरक्षित जान लेने के बाद इस स्वामिभक्त अश्व ने अंतिम सांस ली। स्वामीभक्ति और निष्ठा का ऐसा उदाहरण इतिहास में दुर्लभ है। चेतक की समाधि और स्मारक आज भी इस भूमि की गौरवगाथा को अमर बनाए हुए हैं। भारत सरकार ने वर्ष 1997 में महाराणा प्रताप राष्ट्रीय स्मारक के निर्माण का कार्य प्रारंभ किया, जो लगभग वर्ष 2008 में पूर्ण हुआ। लंबे इंतजार के बाद 21 जून 2009 को पर्यटन विभाग द्वारा प्रताप प्रतिमा का लोकार्पण केंद्रीय मंत्री डॉ. सी.पी. जोशी, राज्य पर्यटन मंत्री श्रीमती बीना काक तथा खेल मंत्री मंगीलाल गरासिया की उपस्थिति में किया गया। इस ऐतिहासिक अवसर के साथ हल्दीघाटी का नाम विश्व पर्यटन मानचित्र पर स्वर्ण अक्षरों में अंकित हो गया। हल्दीघाटी अपने चैतरी गुलाब उत्पादों तथा मोलेला की प्रसिद्ध टेराकोटा (मिट्टी कला) के लिए भी विश्वप्रसिद्ध है। किंतु पर्यटन विभाग द्वारा युद्धभूमि रक्त तलाई और मुख्य हल्दीघाटी दर्रे के बजाय निजी कुटीर उद्योगों को सरकारी प्रकाशनों में अधिक महत्व दिया जा रहा है। प्रशासन के संरक्षण में यह कुटीर उद्योग बालिचा गाँव को हल्दीघाटी का हिस्सा बताकर राष्ट्रीय स्मारक क्षेत्र के निकट अतिक्रमण और इतिहास के विकृतिकरण का कार्य कर रहा है। आज भी आवश्यकता है कि हल्दीघाटी के गौरव के अनुरूप इसका व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाए तथा ग्राम पर्यटन के माध्यम से स्थानीय ग्रामीण विकास को बढ़ावा दिया जाए।